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वायुमंडल में जल एवं इसके विभिन्न स्वरूप || Water and its various forms in the atmosphere

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  • Posted on:
    August 03, 2021

हम अच्छी तरह से जानते हैं कि हवा में जलवाष्प मौजूद होती है। इसमें वायुमंडल के आयतन में 0 से लेकर 4% तक की भिन्नता होती है। मौसम के परिवर्तन में इसका अति महत्वपूर्ण योगदान रहता है। जिस तरह हमें पता है कि जल वायुमंडल में तीन अवस्थाओं में उपस्थित होता है ,वे तीन अवस्थाएं यह हैं- ठोस, द्रव, एवं गैस।

वायुमंडल में आर्द्रता, जलाशयों ,झीलों एवं समुद्रों से वाष्पीकरण तथा पौधों में वाष्पोत्सर्जन से मिलता है। इस तरह वायुमंडल, महासागरों तथा महाद्वीपों के बीच जल का लगातार आदान- प्रदान वाष्पीकरण ,वाष्पोत्सर्जन संघनन एवं वर्षा की प्रक्रिया के माध्यम से चलता है। हवा में मौजूद जलवाष्प को ही आर्द्रता की संज्ञा दी जाती है, अर्थात इसे ही आर्द्रता कहते हैं। वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प की उचित मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहा जाता है ।

आर्द्रता हवा के प्रति इकाई आयतन में जलवाष्प का वजन है एवं इसे ग्राम प्रति घन मीटर के रूप में व्यक्त करते हैं। हवा के द्वारा जलवा स्कोर ग्रहण करने की क्षमता पूर्ण रूप से तापमान पर निर्भर होती है। निरपेक्ष आर्द्रता पृथ्वी की सतह पर अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग होती है। दिए गए तापमान पर अपनी पूर्ण योग्यता की तुलना में वायुमंडल में मौजूद आर्द्रता के प्रतिशत को सापेक्ष आर्द्रता की संज्ञा दी गई है। जब हवा का तापमान बदलता है तब ही आर्द्रता को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है एवं सापेक्ष आर्द्रता भी पूरी तरह से प्रभावित होती है। यह महासागरों के ऊपर सबसे ज्यादा एवं महाद्वीपों के ऊपर सबसे कम होती हैं।

किसी निश्चित तापमान पर जलवाष्प से पूरी तरह पूरित हवा को संतृप्त कहते हैं। इससे तात्पर्य यह है कि हवा इस दशा में या स्थिति में दिए गए तापमान पर और ज्यादा आर्द्रता को ग्रहण करने हेतु अक्षम है। हवा के दिए गए प्रतिदर्श में जिस तापमान पर संतृप्तता आती है उसे ओसांक कहा जाता है।

जल विभिन्न रूपों में-

1. ओस- जब आर्द्रता धरातल के ऊपर हवा में संघनन केंद्र पर संघनित न होकर किसी ठोस वस्तु जैसे पत्थर ईंट लकड़ी पेड़ों की पत्तियां की ठंडी सतहों में पानी की बूंदों के रूप में एकत्र हो जाती हैं तब इसे उसके नाम से जानते हैं। ओस बनने के लिए सबसे उपयुक्त अवस्थाएं साफ आसमान, शांतिमय हवा, सापेक्ष आर्द्रता और ठंडी एवं लंबी रातें होना आवश्यक हैं।

2. तुषार- यह ठंडी सतहों पर बनता है जब संघनन तापमान के जमाव बिंदु से जाने की अवस्था में होता है अर्थात ओसांक जमाव बिंदु पर होता है। अतिरिक्त नमी पानी की बूंदों की बजाए छोटे बर्फ के रूप में एकत्र हो जाती हैं। तुषार के बनने की अवस्थाएं उसके बनने के अवस्थाओं के समान हैं, केवल हवा का तापमान जमाव बिंदु पर ही होना चाहिए।

3. कुहासा एवं कोहरा- जब बहुत ज्यादा मात्रा में जलवाष्प से भरी हुई वायु अचानक नीचे की ओर गिरती है तब छोटे-छोटे धूल के कण ऊपर ही संघनन की प्रक्रिया होती है। इसलिए कोहरा एक बादल भी है जिसका आधार सतह पर या सतह के बहुत किनारे होता है। इनके कारण दृश्यता कम से शून्य तक पहुंच जाती है। ऐसी स्थिति को, जहां कोहरा तथा धुआँ शामिल होकर बनते हो तब हम इस प्रक्रिया को धूम्र कोहरा कहते हैं। कुहासा पहाड़ी इलाकों पर ज्यादा होता है एवं कोहरा जहां गर्म हवा की धारा ठंडी हवा के संपर्क में आ जाती है वहां यह अत्यधिक मात्रा में होते हैं।

4. बादल- यह पानी की छोटी-छोटी बूँदों या बर्फ के छोटे-छोटे रवों की संहति होता है जोकि एक पर्याप्त ऊंचाई पर स्वतंत्र हवा में जलवा सके संघनन के कारण इनका आकार बनता है। बादल का निर्माण पृथ्वी की सतह से कुछ ऊंचाई पर ही होता है इसी कारण यह अलग-अलग आकारों के होते हैं।


आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
Thank you.

R. F. Tembhre
(Teacher)
edudurga.com

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