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पाठ- 2 'ल्हासा की ओर' (यात्रा-वृत्तान्त, लेखक- राहुल सांकृत्यायन) || पाठ का सारांश, प्रश्नोत्तर, भाषा अध्ययन, रचना और अभिव्यक्ति || कक्षा 9 हिन्दी

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पाठ सारांश - "ल्हासा की ओर"

लेखक कहते हैं कि हम नेपाल से तिब्बत जाने के रास्ते पर जा रहे थे। इसी से भारत और चीन की चीजें जाती थीं। सैनिकों का भी यही रास्ता था, इसीलिए जगह-जगह सैनिक चौकियाँ बनी थीं। काफी चौकियाँ टूट गई थी किन्तु बचे दुर्ग के भागों में किसान आ बसे थे। ऐसे एक किले में वे चाय पीने ठहर गए। तिब्बत में यात्रियों के लिए कष्ट हैं तो कुछ सुविधाएँ भी है। वहाँ जात-पात तथा छुआछूत नहीं है। वहाँ की औरतें परदा भी नहीं करती हैं। भिखारियों के अलावा कोई भी उनके घरों में अन्दर तक जाकर चाय बनवाकर पी सकता है। वे भी वहीं ठहर गए। वहाँ से चले तो राहदारी माँगी गई, उन्होंने दो चिटें दे दी। वे उसी दिन आखिरी गाँव जा ठहरे। पाँच साल पहले जब वे भद्र आदमी की तरह यहाँ आए थे तो किसी ने उन्हें नहीं ठहराया था। वे लोग शाम के समय पीकर अपना होश खो बैठते हैं।

उन्हें आगे बहुत ऊँचा टीला पार करना था जहाँ मीलों तक गाँव नहीं होते। यहाँ डाकू लूटते हैं, खून कर देते हैं। यहाँ पुलिस नहीं रहती। कोई गवाह भी नहीं मिलता है, किन्तु वे तो भिखमंगे वेश में थे अतः खून का कोई भय नहीं था। उन्हें सत्रह मील की ऊँचाई पर जाना था इसलिए घोड़े कर लिए। दूसरे दिन वे डाँड़े पहुँच गए। वे समुद्र से लगभग अठारह हजार फीट की ऊँचाई पर थे। वहाँ एक तरफ हिमालय की सफेद चोटियाँ थीं तो ऊँचे टीले की तरफ न बर्फ थी न हरियाली सबसे ऊँचे स्थान पर डाँड़े के देवता विराजे थे जिनको पत्थरों, सींगों और कपड़े की इंडियों से सजाया गया था। आगे चलकर वे रास्ता भटक गए। घोड़ा बहुत धीमे चल रहा था तो पीछे छूट गए। चार-पाँच घण्टे बाद वे पहुँचे तो सुमति गुस्सा हुए। लङ्कोर में उनको ठहरने को अच्छी जगह मिल गई।

अब वे तिङ्री के बड़े मैदान में थे जो पहाड़ों से घिरा था। सुमति अपने यजमानों को गंडे बाँटना चाहते थे, परन्तु लेखक ने उन्हें पैसे देने का लालच देकर रोक लिया। दूसरे दिन शेकर बिहार पहुँचने पर उन्हें प्रेंम से बिठाया गया। पास में एक मन्दिर में बुद्ध-वचन के अनुवाद की हाथ की लिखी पोथियाँ रखी थीं। लेखक उन्हीं में रम गये। सुमति अपने यजमानों को गंडे बाँट आए। दूसरे दिन अपना सामान उठाया और भिक्षु से विदाई ली।

लेखक परिचय - राहुल सांकृत्यायन

राहुल सांकृत्यायन का जन्म सन् 1893 में उनके ननिहाल गाँव पंदहा, जिला आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनका पैतृक गाँव कनैला था। उनका मूल नाम केदार पांडेय था। उनकी शिक्षा काशी, आगरा और लाहौर में हुई। सन् 1930 में उन्होंने श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। तबसे उनका नाम राहुल सांकृत्यायन हो गया। राहुल जी पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती चीनी, जापानी, रूसी सहित अनेक भाषाओं के जानकार थे उन्हें महापंडित कहा जाता था। सन् 1963 में उनका देहांत हो गया।

राहुल सांकृत्यायन ने उपन्यास, कहानी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, जीवनी, आलोचना, शोध आदि अनेक विधाओं में साहित्य-सृजन किया। इतना ही नहीं उन्होंने अनेक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया। 'मेरी जीवन यात्रा' (छह भाग), 'दर्शन-दिग्दर्शन', 'बाइसवीं सदी', 'वोल्गा से गंगा', 'भागो नहीं दुनिया को बदलो', 'दिमागी गुलामी', 'घुमक्कड़ शास्त्र' उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। साहित्य के अलावा दर्शन, राजनीति, धर्म, इतिहास, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर राहुल जी द्वारा रचित पुस्तकों की संख्या लगभग 150 है। राहुल जी ने बहुत सी लुप्तप्राय सामग्री का उद्धार कर अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य किया है।

यात्रावृत्त लेखन में राहुल जी का स्थान अन्यतम है। उन्होंने घुमक्कड़ी का शास्त्र रचा और उससे होने वाले लाभों का विस्तार से वर्णन करते हुए मंजिल के स्थान पर यात्रा को ही घुमक्कड़ का उद्देश्य बताया। घुमक्कड़ी से मनोरंजन, ज्ञानवर्धन एवं अज्ञात स्थलों की जानकारी के साथ-साथ भाषा एवं संस्कृति का भी आदान-प्रदान होता है। राहुल जी ने विभिन्न स्थानों के भौगोलिक वर्णन के अतिरिक्त वहाँ के जन-जीवन की सुन्दर झाँकी प्रस्तुत की है।

प्रश्न अभ्यास

प्रश्न 1 - थोङ्ला के पहले के आखिरी गाँव पहुँचने पर भीखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश में भी उन्हें उचित स्थान नहीं मिल सका। क्यों ?
उत्तर - लेखक इस बार सुमति के साथ थे। वहाँ पर सुमति के परिचित लोग थे। इसलिए उन्हें भीखमंगे के वेश में भी ठहरने की अच्छी जगह मिल गई। दूसरी यात्रा में सुमति साथ नहीं थे। लेखक को ठहरने के स्थानों की अच्छी तरह जानकारी नहीं थी। वे तब भद्रवेश में थे किन्तु उन्हें ठहरने के लिए गाँव के बहुत गरीब झोंपड़े में स्थान मिला। साथ ही जिस समय वे वहाँ पहुँचे थे वहाँ के लोग नशे में अपने होश हवास खोए हुए थे। उनकी मनोवृत्ति दुरुस्त नहीं थी। इसलिए भी उन्होंने ठहराने को मना कर दिया होगा।

प्रश्न 2 - उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था ?
उत्तर - यात्रियों को तिब्बत जाने के लिए डाँड़े पार करने पड़ते हैं। वहाँ पर डाँड़ें सबसे अधिक खतरे की जगहें हैं। मीलों तक गाँव नहीं होते। निर्जन स्थानों में डाकू रहते हैं। यहाँ खून तक हो जाते हैं। वहाँ हथियार का कानून नहीं है इसलिए डाकू हथियारों को लिए रहते हैं। यात्रियों को इन्हीं स्थानों पर लूटने तथा खून कर देने का भय बना रहता है।

प्रश्न 3 - लेखक लङ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से किस प्रकार पिछड़ गया?
उत्तर - लङ्कोर के मार्ग में लेखक घोड़े पर जा रहे थे। जो घोड़ा लेखक के पास था वह अचानक बहुत धीरे-धीरे चलने लगा। वे उसे जब हाँकते तो वह और सुस्त पड़ जाता था। साथ ही एक जगह पर दो रास्ते फूट रहे थे। लेखक गलती से उस मार्ग पर चल पड़े जो लङ्कोर नहीं जाता था। मील-डेढ़ मील चलकर उन्हें पता चला कि यह रास्ता गलत है। अतः वे लौटकर आए तथा सही मार्ग से लङ्कोर के लिए चले। इसी कारण से वे अपने साथियों से काफी पिछड़ गए।

प्रश्न 4 - लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परन्तु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया?
उत्तर - लेखक मार्ग में समय बर्बाद नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने सुमति को यजमानों के पास जाने से रोका। किन्तु दूसरी बार लेखक को एक मन्दिर में बुद्ध वचन के अनुवाद, कन्जुर की हाथ की लिखी 103 पोथियाँ रखी मिली थीं। लेखक उनको पढ़ने में रम गए थे। इसलिए वे कुछ समय रुकना चाहते थे। यही कारण है कि उन्होंने सुमति को यजमानों के पास जाने से नहीं रोका।

प्रश्न 5 - अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
उत्तर- लेखक को अपनी यात्रा के दौरान कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
(1) उन्हें भीखमंगे के वेश में यात्रा पर निकलना पड़ा।
(2) रास्ता पहाड़ी था इसलिए ऊँचाइयों पर चढ़ना कष्टकारक रहा। बीच में निर्जन होने. के कारण डाकुओं का भय बना रहा।
(3) हर जगह घोड़े नहीं मिले इसलिए उन्हें पीठ पर वजन लादकर पैदल भी चलना पड़ा।
(4) लेखक को जो घोड़ा मिला वह बहुत धीरे-धीरे चल रहा था, जोर देने पर वह और सुस्त पड़ जाता था।
(5) वे एक जगह गलत रास्ते पर एक-डेढ़ किलोमीटर चले गए तो वहाँ से लौटना पड़ा। इस तरह वे अपने साथियों से पिछड़ गए।

प्रश्न 6 - प्रस्तुत यात्रा वृत्तांत के आधार पर बताइए कि उस समय का तिब्बती समाज कैसा था?
उत्तर - प्रस्तुत यात्रा वृत्तांत के आधार पर हम कह सकते हैं कि उस समय के तिब्बती समाज में कई अच्छाइयाँ थीं। वहाँ जाति-पाँति का कोई भेदभाव नहीं था। छुआ-छूत जैसी सामाजिक बीमारी भी वहाँ नहीं थी। वहाँ स्त्रियाँ परदा भी नहीं करती थीं। वहाँ अपरिचित लोग भी घर के अन्दर तक जा सकते थे। यात्री अपनी झोली से चाय निकालकर उन घरों में बहू या सास को दे देते तो वे उसे पकाकर दे देती थीं। मक्खन और सोडा देने पर दूध के रंग की चाय बनाकर मिट्टी के टोंटीदार बर्तन में दे देती थीं। उस समाज में यह बहुत खराब आदत थी कि वे शाम को छङ् पीकर अपने होश- हवास खो बैठते थे।

प्रश्न 7 - 'मैं अब पुस्तकों के भीतर था।' नीचे दिए गए विकल्पों में से कौन सा इस वाक्य का अर्थ बतलाता है।
(क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।
(ख) लेखक पुस्तकों की शैल्फ़ के भीतर चला गया।
(ग) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं।
(घ) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।
उत्तर - (क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 8 - सुमति के यजमान और अन्य परिचित लोग लगभग हर गाँव में मिले, इस आधार पर आप सुमति के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं का चित्रण कर सकते हैं?
उत्तर - (1) पुरोहिती का बड़ा क्षेत्र - यात्रा के दौरान सुमति के यजमान तथा परिचित लोग प्रायः प्रत्येक गाँव में थे। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि उसका पुरोहिती का क्षेत्र बहुत बड़ा था।
(2) व्यवहार में कुशल - सुमति व्यवहार में बहुत कुशल थे इसलिए उनके यजमान उनका सम्मान करते थे।
(3) रुपयों के लालची - सुमति को रुपयों का बहुत लालच था, वह लेखक को रूपये देने को कहने पर यजमानों के पास जाने से रुक गए।
(4) उग्र स्वभाव - सुमति उग्र स्वभाव के थे। लेखक के पिछड़ जाने पर वे आग बबूला हो गए। किन्तु थोड़ी देर में ही शान्त हो गए।

प्रश्न 9 - "हालांकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी ख्याल रखना चाहिए था।" उक्त कथन के अनुसार हमारे आचार-विचार के तरीके वेशभूषा के आधार पर तय होते हैं। आपकी समझ से यह उचित है अथवा अनुचित, विचार व्यक्त करें।
उत्तर - वेशभूषा का हमारे व्यक्तित्व से बहुत निकट का सम्बन्ध होता है। वेशभूषा का देखने वाले पर प्रभाव पड़ता है। हम वेशभूषा से व्यक्ति को जैसा समझते हैं उसी के अनुरूप उसके साथ व्यवहार करते हैं। सामान्यतः यह बात उचित है किन्तु हमें मात्र वेशभूषा ही नहीं व्यक्ति के गुण-अवगुणों को जानकर उसके प्रति व्यवहार करना चाहिए। मेरे विचार से व्यक्ति के विषय में जानने के बाद ही उससे आचार-विचार का तरीका अपनाना चाहिए। वेशभूषा तो व्यक्ति का बाहरी रूप है, अतिथि सत्कार हमारा धर्म है।

प्रश्न 10 - यात्रा वृत्तान्त के आधार पर तिब्बत की भौगोलिक स्थिति का शब्द-चित्र प्रस्तुत करें। वहाँ की स्थिति आपके राज्य/शहर से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर - तिब्बत प्रमुख पर्यटन स्थल है। इसकी भौगोलिक स्थिति बहुत सुन्दर है। वहाँ ऊँचे-ऊँचे सफेद बर्फ के शिखरों वाले पर्वत है। इसकी सीमा हिमालय पर्वत से प्रारम्भ होत है। ये समुद्रतल से सत्रह-अठारह हजार फीट की ऊँचाई पर हैं। भीटे के एक तरफ के पहाड़ों पर बर्फ भी नहीं है तथा हरियाली भी नहीं है। उत्तर की ओर पत्थर ही पत्थर हैं। तिब्बत में ड़ाँड़े सबसे खतरनाक जगह है। यहाँ कई मील तक गाँव नहीं मिलते हैं, निर्जन है। नदियों और पर्वतों की वजह से दूर तक देख भी नहीं पाते हैं।
हमारा राज्य तथा शहर समतल भूमि पर स्थित है। यहाँ पहाड़ नहीं हैं। यहाँ बर्फ भी नहीं पड़ती है। यहाँ नदियों का पानी है। हरी-भरी फसलें हैं, घास एवं वनस्पतियाँ भी हैं।

प्रश्न 11 - आपने भी किसी स्थान की यात्रा अवश्य की होगी। यात्रा के दौरान हुए अनुभवों को लिखकर प्रस्तुत करें।
उत्तर - मुझे अमरकंटक की यात्रा का अवसर मिला है। मुझे इस यात्रा में बड़ा आनन्द आया मैं, पिताजी, माताजी तथा मेरी छोटी बहन यात्रा पर गए थे। हमने अपने शहर से पेंड्रा रोड स्टेशन तक रेलगाड़ी से यात्रा की। स्टेशन से बाहर निकलते ही अमरकंटक के लिए टैक्सी मिल गई। पहाड़ी क्षेत्र की टेड़ी-मेड़ी सड़कों को पार करती हुई टैक्सी मध्यम गति से दौड़ रही थी। दोनों ओर की हरियाली देखकर हमारा मन प्रसन्न हो रहा था। विध्य पर्वतों पर पहुँचने पर सौन्दर्य का भण्डार दिखाई पड़ने लगा। हम सबसे पहले नर्मदा के उद्गम स्थान पर पहुँचे। वहाँ के भव्य मन्दिरों ने हमारा मन मोह लिया। पास ही माई की बगिया में गए। वहाँ से कपिल धारा, दूध धारा गए। झरनों से गिरने वाला पानी का रंग दूध की तरह सफेद था। हम जोहिला नदी का प्रारम्भ देखने के बाद टैक्सी से ही पेंड्रा रोड स्टेशन लौट आए। इस यात्रा की याद हमारे मानस में आज भी ज्यों की त्यों ताजा बनी हुई है।

प्रश्न 12 - यात्रा वृत्तान्त गद्य साहित्य की एक विधा है। आपकी इस पाठ्य-पुस्तक में कौन-कौन सी विधाएँ हैं? प्रस्तुत विधा इनसे किन मायनों में अलग है?
उत्तर - यात्रा वृत्तान्त गद्य साहित्य की गौण विधाओं में से एक है। हमारी पाठ्य-पुस्तक में कहानी, निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज, व्यंग्य, रेखाचित्र आदि गद्य विधाओं की रचनाएँ हैं। यात्रा वृत्तान्त और इन विधाओं में कई बातें अलग है। यात्रा वृत्तान्त में निबन्ध की सी गम्भीरता, भावुकता या विचारशीलता नहीं होती है। इसमें कहानी की विषय-वस्तु, वातावरण आदि भी नहीं होता है। संस्मरण, रेखाचित्र जैसी मार्मिक स्मृति यात्रा वृतान्त में नहीं होती है। यात्रा वृत्तान्त में कहीं-कहीं व्यंग्य का पुट हो सकता है, किन्तु व्यंग्य रचना में जो चुटीलापन होता है वह इसमें नहीं होता है। रिपोर्ताज घटना का प्रत्यक्ष दर्शन करा देता है जबकि यात्रा वृत्तान्त यात्रा का रसात्मक वर्णन प्रस्तुत करते हैं।

भाषा अध्ययन

प्रश्न 13 - किसी भी बात को अनेक प्रकार से कहा जा सकता है, जैसे -
सुबह होने से पहले हम गाँव में थे।
पौ फटने वाली थी कि हम गाँव में थे।
तारों की छाँव रहते-रहते हम गाँव पहुँच गए।

नीचे दिए गए वाक्य को अलग-अलग तरीके से लिखिए -
जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे चल रहा है या पीछे।
उत्तर - (1) जान नहीं पड़ रहा था कि मैं आगे हूँ या घोड़ा आगे है।
(2) यह जानना कठिन था कि घोड़ा आगे चल रहा है या पीछे।
(3) घोड़े की चाल ऐसी थी कि उससे यह पता नहीं लग पा रहा था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे लौट रहा है।

प्रश्न 14 - ऐसे शब्द जो किसी 'अंचल' यानी क्षेत्र विशेष में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें आँचलिक शब्द कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में से आँचलिक शब्द ढूँढकर लिखिए।
उत्तर - प्रस्तुत पाठ में प्रयोग किए गए आँचलिक शब्द इस प्रकार हैं - चौङी, खोटी, राहदारी, छङ, डाँड़ा, कुची-कुची, भीटे, थुक्पा, भरिया, नम्से।

प्रश्न 15 - पाठ में कागज, अक्षर, मैदान के आगे क्रमशः मोटे, अच्छे और विशाल शब्दों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों से उनकी विशेषता उभर कर आती है। पाठ में से कुछ ऐसे ही और शब्द छाँटिए जो किसी की विशेषता बता रहे हैं।
उत्तर - इस पाठ में शब्दों की विशेषता उभारने वाले कुछ शब्द इस प्रकार हैं - परित्यक्त चीनी किले, आखिरी गाँव, अच्छी जगह, सबसे गरीब झोंपड़े खतरे की जगह, निर्जन स्थानों सर्वोच्च स्थान, पूरे गुस्से, अच्छे यजमान, गरमा-गरम थुक्पा, बहुत ज्यादा हिस्सा, अच्छा मन्दिर आदि।

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I hope the above information will be useful and important.
(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
edudurga.com

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