प्रश्न 1. प्राकृतिक तन्तु किसे कहते हैं? उसके स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर– कुछ वस्त्रों, जैसे सूती, जूट, रेशमी तथा ऊनी के तन्तु पादपों तथा जन्तुओं से प्राप्त होते हैं। इन्हें प्राकृतिक तन्तु कहते हैं। रूई तथा जूट (पटसन) पादपों से प्राप्त होने वाले तन्तुओं के उदाहरण हैं। ऊन तथा रेशम जन्तुओं से प्राप्त होते हैं। ऊन, भेड़ अथवा बकरी की कर्तित ऊन से प्राप्त होती है। इसे खरगोश, याक तथा ऊँटों के बालों से भी प्राप्त किया जाता है। रेशमी तन्तु रेशम-कीट कोकून से खींचा जाता है।
प्रश्न 2. कपास ओटना प्रक्रिया को समझाइए।
उत्तर– कपास पादप के फल को कपास गोलक या कपास बॉल कहते हैं। साधारणतया इन कपास बॉलों से कपास को हस्त चयन द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसके पश्चात् कपास से बीजों को कंकतन द्वारा पृथक किया जाता है। इस प्रक्रिया को कपास ओटना कहते हैं। पारम्परिक ढंग से कपास हाथों से ओटी जाती थी। आजकल कपास ओटने के लिए मशीनों का उपयोग भी किया जाता है।
प्रश्न 3. पटसन तन्तु की खेती किस ऋतु में एवं भारत के किस प्रदेश में की जाती है?
उत्तर– भारत में पटसन की खेती वर्षा ऋतु में की जाती है। भारत में पटसन को प्रमुख रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार तथा असम में उगाया जाता है।
प्रश्न 4. कताई का कार्य किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर– रेशों से तागा बनाने की प्रक्रिया को 'कताई' कहते हैं। इस प्रक्रिया में, रुई के एक पुंज से रेशों को खींचकर ऐंठते हैं। ऐसा करने से रेशे पास-पास आ जाते हैं और तागा बन जाता है।
प्रश्न 5. संश्लिष्ट तन्तु किन पदार्थों से मिलकर बनते हैं? संश्लिष्ट तन्तुओं के उदाहरण दीजिए।
उत्तर– हज़ारों वर्ष तक वस्त्र निर्माण के लिए केवल प्राकृतिक तन्तुओं का ही उपयोग होता था। पिछले लगभग सौ वर्षों से ऐसे रासायनिक पदार्थों, जिनका स्रोत पादप अथवा जन्तु नहीं हैं, से तन्तुओं का निर्माण किया जा रहा है। इन्हें संश्लिष्ट तन्तु कहते हैं। पॉलिएस्टर, नायलॉन और एक्रिलिक, संश्लिष्ट तन्तुओं के कुछ उदाहरण हैं।
प्रश्न 6. कपास पादप तथा पटसन पादप में दो अन्तर बताइये।
उत्तर– कपास खेतों में उगाया जाता है। साधारणतया कपास के पौधे वहाँ उगाए जाते हैं, जहाँ की मृदा काली तथा जलवायु उष्ण होती है। कपास पादप के फल (कपास गोलक) लगभग नींबू की माप के होते हैं। पूर्ण परिपक्व होने पर बीज टूटकर खुल जाते हैं तथा अब कपास तन्तुओं से ढके बिनौले (कपास बीज) को देखा जा सकता है। इस समय खेत कपास के परिफुल्लों (रोवों) से इतना श्वेत हो जाता है जैसे हिम ने ढक लिया हो। साधारणतया इन कपास बॉलों से कपास को हस्त चयन द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसके पश्चात कपास से बीजों को कंकतन द्वारा पृथक किया जाता है। इस प्रक्रिया को 'कपास ओटना' कहते हैं। पारम्परिक ढंग से कपास हाथों से ओटी जाती थी। आजकल कपास ओटने के लिए मशीनों का उपयोग भी किया जाता है।
पटसन तन्तु को पटसन पादप के तने से प्राप्त किया जाता है। भारत में इसकी खेती वर्षा ऋतु में की जाती है। भारत में पटसन को प्रमुख रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार तथा असम में उगाया जाता है। सामान्यतः पटसन पादप (फसल) को पुष्पन अवस्था में काटते हैं। फसल कटाई के पश्चात पादपों के तनों को कुछ दिनों तक जल में डुबाकर रखते हैं। ऐसा करने पर तने गल जाते हैं और उन्हें पटसन तन्तुओं से हाथों द्वारा पृथक कर दिया जाता है। वस्त्र बनाने से पहले इन सभी तन्तुओं को तागों में परिवर्तित कर लिया जाता है।
प्रश्न 7. निम्न में से प्राकृतिक और संश्लिष्ट तन्तु छाँटकर लिखिए– पालिएस्टर, ऊन, नायलान, रेशम, कपास, एक्रिलिक।
उत्तर– प्राकृतिक तन्तु– ऊन, रेशम, कपास।
संश्लिष्ट तन्तु– पालिएस्टर, नायलान, एक्रिलिक।
प्रश्न 8. कताई के लिए कौन-कौन सी सरल युक्तियों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर– कताई के लिए एक सरल युक्ति 'हस्त तकुआ' का उपयोग किया जाता है, जिसे 'तकली' कहते हैं। हाथ से प्रचालित कताई में उपयोग होने वाली एक अन्य युक्ति चरखा है। चरखे के उपयोग को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन के एक पक्ष के रूप में लोकप्रियता प्रदान की थी। वृहत् पैमाने पर तागों की कताई का कार्य कताई मशीनों की सहायता से किया जाता है। कताई के पश्चात तागों का उपयोग वस्त्र बनाने में किया जाता है।
प्रश्न 9. तागे से वस्त्र बनाने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर– तागे से वस्त्र बनाने की कई विधियाँ हैं। इनमें दो प्रमुख विधियाँ बुनाई तथा बंधाई हैं।
बुनाई– वस्त्र तागों के दो सेटों, जिन्हें एक साथ व्यवस्थित किया जाता है, से मिलकर बनते हैं। तागों के दो सेटों को आपस में व्यवस्थित करके वस्त्र बनाने की प्रक्रिया को 'बुनाई' कहते हैं। वस्त्रों की बुनाई करघों पर की जाती है। करघे या तो हस्तप्रचालित होते हैं अथवा विद्युतप्रचालित।
बंधाई– बंधाई में किसी एकल तागे का उपयोग वस्त्र के एक टुकड़े को बनाने में किया जाता है। मोजे और बहुत-सी अन्य पहनने की वस्तुएँ बंधाई द्वारा बने वस्त्रों से बनाई जाती हैं। बंधाई हाथों से तथा मशीनों द्वारा भी की जाती है।
बुनाई तथा बंधाई का उपयोग विभिन्न प्रकार के वस्त्रों के निर्माण में किया जाता है। इन वस्त्रों का उपयोग पहनने की विविध वस्तुओं को बनाने में होता है।
प्रश्न 10. प्राचीन काल में लोग पहनने के लिए किस प्रकार की सामग्री का उपयोग करते थे? बताइए।
उत्तर– वस्त्रों के विषय में आद्य प्रमाणों से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में लोग वृक्षों की छाल (वल्क), बड़ी-बड़ी पत्तियों अथवा जन्तुओं की चर्म और समूर से अपने शरीर को ढकते थे। कृषि समुदाय में बसना आरम्भ करने के पश्चात लोगों ने पतली-पतली टहनियों तथा घास को बुनकर चटाईयाँ तथा डलियाँ (टोकरी) बनाना सीखा। लताओं, जन्तुओं की ऊन अथवा बालों को आपस में ऐंठन देकर लम्बी लड़ियाँ बनाईं। इनको बुनकर वस्त्र तैयार किए। आद्य भारतवासी रुई से बने वस्त्र पहनते थे, जो गंगा नदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में उगाई जाती थी। फ्लैक्स भी एक पादप है, जिससे प्राकृतिक तन्तु प्राप्त होता है। आद्य मिश्र में वस्त्रों को बनाने के लिए रुई तथा फ्लैक्स की कृषि नील नदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में की जाती थी। उन दिनों में लोगों को सिलाई करना नहीं आता था। उस समय लोग अपने शरीर के विभिन्न भागों को वस्त्रों से आच्छादित कर लेते थे। वे शरीर को आच्छादित करने के लिए कई विभिन्न ढंगों का उपयोग करते थे। सिलाई की सुई के आविष्कार के साथ लोगों ने वस्त्रों की सिलाई करके पहनने के कपड़े तैयार किए। इस आविष्कार के पश्चात सिले कपड़ों में बहुत-सी विभिन्नताएँ आ गई हैं। परन्तु क्या यह आश्चर्यजनक बात नहीं है, कि आज भी साड़ियों, धोतियों, लुंगियों अथवा पगड़ियों का बिना सिले वस्त्रों के रूप में उपयोग किया जाता है?
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आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope the above information will be useful and important. )
Thank you.
R. F. Tembhre
(Teacher)
edudurga.com
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